सत्य पुरूष कबीर साहिब जी की अमृतवाणी में ” सुमिरण का महत्व ” :-कबीरवाणी

सुमिरन का अंग

कबीर, सुमरन मार्ग सहज का,
सतगुरु दिया बताय।
स्वास्-उस्वास् जो सुमिरता,
एक दिन मिलसी आय।।

कबीर,माला स्वास् उस्वास् की ,
फेरेंगे निज दास ।
चौरासी भरमे नही,
कटे करम की फाँस।।

कबीर,कबीर सुमरन सार है,
और सकल जंजाल ।
आदि अंत मधि सोंधिया,
दूजा देखा ख्याल।।

कबीर,निजसुख आत्म राम है,
दूजा दुःख अपार ।
मनसा वाचा कर्मना ,
कबीरा सुमिरन सार ।।

कबीर,दुःख मे सुमिरण सब करे,
सुख मे करे ना कोय ।
जो सुख मे सुमिरण करे,
तो दुःख काहे को होय ।।

कबीर,सुख मे सुमिरण

किया नही,
दुःख मे करते याद ।
कहे कबीर ता दास की ,
कौन सुन्ने फरियाद ।।

कबीर,साईं यों मति जानियो,
प्रीति घटै मम चित् ।
मरूं तो तुम सुमिरत मरूं,
जीवत सुमरू नित्य ।।

कबीर,जिन हरि जैसा सुमरिया,
ताको तैसा लाभ।
ओसा प्यास न भागई,
जबलग धंसे न आब।।

कबीर,जप तप संयम साधना,
सब सुमिरन के माँहि।
कबीरा जानें रामजन,
सुमिरन सम कछु नाहिं।।

कबीर,सुमिरन की सुधि यों करो,
जैसे दाम कंगाल।
कहै कबीर विसरे नहीं,
पल पल लेत संभाल ।।

कबीर,सुमिरन सों मन लाइये,
जैसे पानी मीन ।
प्राण तजै पल बिसरै,
दास कबीर कहि दीन ।।

कबीर,सतनाम सुमिरले,
प्राण जाहिंगे छूट।
घर के प्यारे आदमी,
चलते लेइगे लूट ।।

कबीर,लूट सकै तो लुटिले ,
राम नाम है लूट।
पीछै फिरि पछिताहुगे,
प्राण जायेंगे छूट ।।

कबीर,सोया तो निष्फल गया,
जागों सो फल लेय।
साहिब हक्क न राखसी,
जब मांगे तब देय।।

कबीर,चिंता तो हरी नाम की,
और न चितवै दास।
जो कछु चितवै नाम बिनु,
सोई काल की फाँस।।

कबीर,जबही सतनाम ह्रदय धरयो,
भयो पाप को ना।
मानों चिंगारी अग्नि की,
पड़ी पुराने घास ।।

कबीर,राम नाम को सुमिरता,
अधम तिरे अपार।
अजामेल गणिका सुपच,
सदना,सिवरी नार ।।

कबीर,स्वपन ही में बरराय के,
जो कोई कहे राम ।।
वाके पग की पाँवड़ी,
मेरे तन का चाम ।।

कबीर,नाम जपत कन्या भली,
साकट भला न पूत।
छेरी के गल गलथना,
जामें दूध न मूत।।

कबीरा,सब जग निर्धना,
धनवंता नाही कोय।
धनवंता सोई जानिये,
राम नाम धन होय।।

कबीर,कहता हूं कहि जात हूँ,
कहूं बजा के ढोल।
स्वांस जो खाली जात है,
तीन लोक का मोल।।

कबीर,ऐसे महंगे मोल का,
एक स्वांस जो जाय।
चौदह लोक नही पटतरे,
काहे धूरि मिलाय।।

कबीर,जिवना थोरा ही भला,
जो सत् सुमिरन होय।
लाख बरस का जिवना,
लेखे धरे न कोय।।

कबीर,कहता हूँ कहि जात हूं,
सुनता है सब कोय।
सुमिरन सो भला होयगा,
नातर भला न होय।।

कबीर,कबीरा हरि की भक्ति बिन,
धिग जीवन संसार।
धुंआ का सा धौलहरा,
जात न लागै बार।।

कबीर,भक्ति भाव भादों नदी,
सबै चली घहराय।
सरिता सौई जानिये,
ज्येष्ठ मास ठहराय ।।

कबीर,भक्ति बीज बिनसै नाही,
आय परै सौ झोल।
जो कंचन विष्ठा परै,
घटै न ताको मोल।।

कबीर,कामी क्रोधी लालची,
इनपे भक्ति न होय।
भक्ति करे कोई शूरमा,
जाति वर्ण कुल खोय।।

कबीर,जबलग भक्ति सहकामना,

तब लग निष्फल सेव।
कहै कबीर वे क्यों मिलै,

निष्कामी निज देव।। 

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