ईमानदारी की परीक्षा(जरूर पढ़ें प्रेरणादायक कहानी)

एक गांव में एक पण्डित रहा करता था।गांव में पुराणों का ज्ञान प्रचार करके दान आदि से गुजारा किया करता था।पण्डित जी का बोलबाला गाँव में निरंतर बढ़ता जा रहा था।हर गांववासी उनका आदर करता था।पण्डित जी के बढ़ते बोलबाले से हर कोई प्रभावित था।गांव के ही एक बस कंडक्टर ने पंडित जी की परीक्षा लेनी चाही ।कुछ दिन बाद पण्डित जी किसी कारण वश शहर जा रहे थे तो सयोग वश वही बस आ गई जिस में उस गांव का वो बस कन्डेक्टर था। पण्डित जी को देखते ही उसने सोचा कि आज परीक्षा लेने का अच्छा मौका है पता चल जाएगा की ये पण्डित कितना ज्ञानी है। उसने पण्डित जी की टिकट बनाई और बाकी पैसों में दस रुपये ज्यादा दे दिए और आगे को टिकट बनाता हुआ निकल गया।

तभी पण्डित ने पैसे गिनने तो दस रुपये ज्यादा थे ,उसने सोचा कि कंडक्टर का ध्यान नही था गलती से दे दियो इसको क्या पता और जेब मे रख लिए।
मन ही मन सोच रहा था कि की पैसे वापिस दे या न दे ।कुछ बाद में उसका स्थान आ गया जहाँ उसे उतरना था।

बस रुकने वाली थी । पण्डित जी ने दस रुपये निकाले और कंडक्टर को दे दिये और कहा कि आप ने गलती से ज्यादा दे दिए।
तभी झट से कंडक्टर बोला गलती से नही जानबूझ कर दिए थे देख रहा था कि आप ज्ञान बाटते ही हो या ग्रहण भी करतें हो।

पैसे देकर पण्डित बस से नीचे उतरा और सोचने लगा कि आज दस रुपये के लालच में पड़ जाता तो सब नष्ट हो जाता शुक्र है परमात्मा का जो समय पर बुद्धि आ गई और उसने प्रतिज्ञा कर ली कि अब कभी ऐसे लालच नही करूंगा।यदि आज अपनी ईमानदारी त्याग देता तो सब व्यर्थ था मेरा भगति करना उपदेश करना।

दोस्तो इस कहानी से हमे यही शिक्षा मिलती है कि हमे कभी भी

एक गांव में एक पण्डित रहा करता था।गांव में पुराणों का ज्ञान प्रचार करके दान आदि से गुजारा किया करता था।पण्डित जी का बोलबाला गाँव में निरंतर बढ़ता जा रहा था।हर गांववासी उनका आदर करता था।पण्डित जी के बढ़ते बोलबाले से हर कोई प्रभावित था।गांव के ही एक बस कंडक्टर ने पंडित जी की परीक्षा लेनी चाही ।कुछ दिन बाद पण्डित जी किसी कारण वश शहर जा रहे थे तो सयोग वश वही बस आ गई जिस में उस गांव का वो बस कन्डेक्टर था। पण्डित जी को देखते ही उसने सोचा कि आज परीक्षा लेने का अच्छा मौका है पता चल जाएगा की ये पण्डित कितना ज्ञानी है। उसने पण्डित जी की टिकट बनाई और बाकी पैसों में दस रुपये ज्यादा दे दिए और आगे को टिकट बनाता हुआ निकल गया।

तभी पण्डित ने पैसे गिनने तो दस रुपये ज्यादा थे ,उसने सोचा कि कंडक्टर का ध्यान नही था गलती से दे दियो इसको क्या पता और जेब मे रख लिए।
मन ही मन सोच रहा था कि की पैसे वापिस दे या न दे ।कुछ बाद में उसका स्थान आ गया जहाँ उसे उतरना था।

बस रुकने वाली थी । पण्डित जी ने दस रुपये निकाले और कंडक्टर को दे दिये और कहा कि आप ने गलती से ज्यादा दे दिए।
तभी झट से कंडक्टर बोला गलती से नही जानबूझ कर दिए थे देख रहा था कि आप ज्ञान बाटते ही हो या ग्रहण भी करतें हो।

पैसे देकर पण्डित बस से नीचे उतरा और सोचने लगा कि आज दस रुपये के लालच में पड़ जाता तो सब नष्ट हो जाता शुक्र है परमात्मा का जो समय पर बुद्धि आ गई और उसने प्रतिज्ञा कर ली कि अब कभी ऐसे लालच नही करूंगा।यदि आज अपनी ईमानदारी त्याग देता तो सब व्यर्थ था मेरा भगति करना उपदेश करना।

दोस्तो इस कहानी से हमे यही शिक्षा मिलती है कि हमे कभी भी लालच वश होकर अपनी ईमानदारी को नही त्यागना चाहिए।ईमानदार व्यक्ति भले ही निर्धन हो लेकिन वो अपने ईमान का बेहद अमीर होता है।
बेईमानी के पैसे से कभी हमारा भला हो नही सकता।

ये कहानी अछि लगी तो शेयर जरूर करें दोस्तों।।

लालच वश होकर अपनी ईमानदारी को नही त्यागना चाहिए।ईमानदार व्यक्ति भले ही निर्धन हो लेकिन वो अपने ईमान का बेहद अमीर होता है।
बेईमानी के पैसे से कभी हमारा भला हो नही सकता।

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